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सगुण पंथ वाले अपनी और निर्गुण मत वाले अपनी ही श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ में निरन्तर लगे हुए है। हमारे धार्मिक विभिन्न पंथों में सुलभता का अभाव एवं व्यर्थ एवं निरर्थक उलझनों का कारण है दिनप्रतिदिन हममे होती संवेदनापूर्ण भावों की कमी, करुणामयी नेत्रविहीनता। हम सिर्फ और सिर्फ स्वयं और अपने आत्मीयजनों के लिए ही जी रहे हैं। आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में बिरले ऐसे मिलेंगे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन परमार्थ हेतु लगा दिया है | वास्तविकता यह है कि अब तक जितने भी पंथों का निर्माण हुआ सब अपनेअपने अनुसार ईश्वर प्राप्ति का मार्ग निर्धारित किये है पर इन पंथों में जितने भी ज्ञान मार्ग का उल्लेख किया गया है,वे सभी कही ना कही किसी ना किसी रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शिव से ही ज्यादा प्रभावित नजर आते है। यह सत्य है कि ये पंथ शिव वाणीशिव ग्रन्थ और जिस भी साधना विधि का उपयोग किये हो, शिव कृपा से ही उत्तरोत्तर आगे बढ़े है।

हमारा मुख्य उद्देश्य अपनी आध्यात्मिक अनुभवों और क्रियाओं यथामन्त्र, तंत्र और योग से समाज में उस गोपनीय ज्ञान का प्रसार करना है जिसके अभाव में आज की पीढ़ी पतन के मार्ग की ओर उन्मुख हो रही है और आमजन भटक रहे हैं | पर अंततः विभिन्न पंथों का अनुसरण करने के बाद भी यही आभास होता है कि जिस परम शांति के लिए ताउम्र भटकना पड़ा वहां भी  शांति का सर्वथा अभाव मिला। शिव अवधूत भी हैंयोगी भी हैंपरम ध्यानी भी है,गृहस्थ भी हैसाधारण भी है और दिव्य भीश्मशान में विचरते शिव की छवि महाअघोरी की हैशिव परम वैष्णव भी हैशिव शक्ति भी हैंशिवविष्णु भी हैशिव सगुण भी हैशिव निर्गुण भी हैंशिव सेवक भी है, शिव ही इकलौते समस्त जगत के स्वामी हैंशिव विभु है,शिव ही एक परम आत्मा सदाशिव हैअधो सगुण विलास हैउर्ध्व निर्गुण शिव ही है।

शिव ही गीता का ज्ञान और वेदों का सार है| वैसे ब्रह्मांड के हर प्राणिमात्र में आत्मा रूप में जीवंत, ब्रह्मांड के अस्तित्व का मूल जगत के स्वामी महामृत्युंज हरदम अपनी अमृतमयी, शीतल छवि से समस्त जीव का कल्याण करते हैं। शिव एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर जीवात्मा अपने प्रारब्ध के प्रतिफल के रूप में जीवन के वास्तविक लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करता है| शिव में श्रद्धा और समर्पण भी शिव कृपा से ही संभव हैमहामृत्युंजय शिव के आशीर्वाद से अनपढ़ व्यक्ति भी वेदउपनिषदों के परम ज्ञान को प्राप्त कर लेता है | इस परम पुरुष आदि सदाशिव का यह ज्ञान अद्भुत है जिससे जीवन के सुख दुख के साथ पूर्व के कर्म दोष का भी पता चल जाता है और शिव कृपा से सारे क्लेश, कष्ट पीड़ा का  शमन होता है | इनकी कृपा से हर विपदा, संकट निवारण के साथ ही व्यक्ति पदप्रतिष्ठा प्राप्त कर धन एवं वंश से सम्पन्न हो जाता है | पर इस कलियुग में वेद के साथ तंत्र का ज्ञान भी शिव की कृपा हैजो स्वयं की सुरक्षा हेतु अतिआवश्यक है

आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में धर्म का दुरुपयोग भी बहुत हो रहा है| ऐसी परिस्थिति में यह ज्ञान दैविक कृपा से भी ज्यादा कल्याणकारी है | महामृत्युन्जय का दिव्य अनुष्ठान अगर पूरी निष्ठा एवं शास्त्रोक्त विधि से कराई जाए तो शीघ्र चमत्कारी परिणाम प्राप्त होते है मृत्यु के मुख से भी खिंच कर लाने की ताकत है इस महामंत्र में | मेरे द्वारा मुझसे जुड़े हुए हजारों आत्मीय जनों के यहाँ कल्याणकारी उद्देश्य से महामृत्युंजय जप अब तक लगभग साठ करोड़ कराया गया है | इसके साथ ही श्री यंत्रप्रयोगचंडीविष्णुगणपतिभैरवसूर्य,हनुमानजी के प्रयोग के उपरांत जो प्रभाव दिखा और जो अनुभूति हुई वो अद्भुत और अलौकिक है | इन सभी क्रियाकलापों का उद्देश्य सिर्फ शिव द्वारा जगत कल्याण ही है | इन क्रियाकलापों में परा ज्ञान के साथ दशमहाविद्या पर गोपनीय विधान का प्रावधान है | 

जिसका मुख्य कारण हमारा पूर्वार्जित कर्म ही है जो हम सभी को इसी जन्म में भोगना पड़ता है | वर्तमान परिदृश्य में कर्म दोष के साथ संदूषित वातावरणखानपान और परिवेश भी इसका मुख्य कारण हैहमारे जीवन में पितृ दोषमाता पिता के दुष्कर्मों का दोष और ऐसे अनेक कारण होते है जिन्हें यदा कदा हमें ही भोगना पड़ता है | इन दोषों के ही रूप में हमे दुर्घटना,अकाल मृत्युमन्त्र तंत्र बाधा के साथ बुरी आत्माओं से भी ग्रस्त होना पड़ता है| कभीकभी तो अपने परिवार में और आपसी रिश्तों में कलह सम्बन्ध विच्छेद की भी स्थिति बन जाती हैघर में अशांति का माहौल व्याप्त हो जाता है तथा विभिन्न प्रकार की दैविक आपदाओं जैसे महामारीभूकम्पयुद्धइत्यादि जैसी नाना संकटों के कारण जीवात्मा को कष्ट झेलना पड़ता है | पूर्व का प्रारब्ध हमारे समक्ष ऐसी परिस्थिति ला देता है जहाँ हम स्वयं को असहाय महसूस करते है, आगे कोई भी रास्ता नजर नहीं आता | सारे सत्कर्मपूजापाठजपतप सब व्यर्थ प्रतीत होता है 

सबसे हार कर वैसी विपरीत और विषम परिस्थिति में जो सम्पूर्ण विश्वास और पूर्ण समर्पण के साथ महामृत्युंजय शिव की शरण में जाता है तो महादेव का यह कल्याणकारी स्वरूप तत्क्षण अपने भक्त को सभी आपदा और कष्टों से बाहर निकाल देते है | इनकी आराधना और ध्यान से जीवन में फिर से सारी खुशियां लौट आती है|करोड़ो लोगों के द्वारा अनुभूत इनकी कृपा जीवन रक्षक होने के साथ ही हर दोष बाधा को दूर करने में सहायक हैं | यहाँ यह जानना अतिमहत्वपूर्ण है कि ये परम कल्याणकारी शिव का स्वरूप महामृत्युंजय सिर्फ मृत्यु और रोग निवारण जैसी विषम परिस्थितियों में ही सहायक नहीं है बल्कि यह परमात्मा की आद्वितीय शक्ति समस्त पाप नाशक और धर्मअर्थकाममोक्ष प्रदान करने वाले हैं| यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि हमारी सभी कामनाओं की पूर्ति किसी एक ईश्वरीय शक्ति के द्वारा हो पाना संभव नहीं है पर महामृत्युंजय शिव एकमात्र ऐसी सत्ता है जो मानव जीवन में हर लौकिक और अलौकिक कामनाओं को तुरंत प्रदान करते हैं।इनकी शक्ति भगवती अमृतेश्वरी है |

 

महामृत्युंज मन्त्र में समस्त देव शक्तियों का बीज मंत्र है | पूर्व में इसी  मंत्र के विशिष्ट मन्त्र संयोजन से मृत संजीवनी का प्रयोग होता था जिसके पूर्ण आचार्य शुक्राचार्य थे।यह शिव का अमृत रूप है, यह ज्ञान शिव से श्री विष्णु को प्राप्त हुआ था और विष्णु से सारे देव ऋषियों ने ग्रहण किया था। मृत्युंजय मन्त्र को ही त्रयम्बक मन्त्र भी कहा गया है जिसमे तैंतीस अक्षर है जो तैंतीस देवता का द्योतक है।इस मंत्र में अनेक देवों की शक्ति सहित विष्णु एवं  भैरव शक्ति भी विद्यमान है।बड़े दिनों से मेरे अंतर्मन में गुरु कृपा से एक करुण व्यथा थी कि इस धरती पर अपने कर्मों के कारण जीवात्मा को नाना प्रकार से जो कष्ट भोगना पड़ता है उसके निराकरण एवं जनकल्याण हेतु एक ऐसे परिवार की नींव रखी जाए|

 

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जिसके सान्निध्य में आते ही जीवात्मा को तुरन्त अपने कष्टों से धीरे धीरे थोड़ी राहत होने लगें | मेरा उद्देश्य है कि अब तक के आध्यात्मिक जीवन में जो कुछ भी दैव कृपा एवं ईश्वरीय भक्ति, साधना से मुझे अनुभूत हुआजो गुरु कृपा से मुझे प्राप्त हुआ उसका जनकल्याणार्थ में सदुपयोग हो सके | इस पृथ्वी पर अवतरित हर जीवात्मा को अपने प्रारब्ध का फल भोगना पड़ता है और सबके जीवन का कर्म मार्ग पूर्व निर्धारित होता हैमहाकाली मेरी इष्ट रही है और उन्हीं की कृपा से महामृत्युंजय मेरे जीवन में आये और इनके शुभागमन से सभी देवीदेवता गएमेरे कुलदेवता श्री हनुमान जी है और मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि अब तक की हर प्राप्ति उनकी ही कृपा का प्रसाद हैअब तक मेरे संपर्क में आये लाखों लोगों के कष्ट निवारण में कई करोड़ महामृत्युंजय मन्त्र का प्रयोग मेरे द्वारा करवाया गया| इस सम्पूर्ण प्रकरण में जो अलौकिक अनुभव रहा वह चमत्कार से भरा हुआ थाआज तक इस महामंत्र का एक भी प्रयोग निष्फल नहीं हुआ

 

जो भी व्यक्ति अपनी पूरी श्रद्धा और भक्ति से पूर्णरूपेण शिव पर समर्पित रहा और मेरे द्वारा कष्ट निवारण या प्राण रक्षा हेतु अनुष्ठान शुरू करवा दिया| ऐसी विकट परिस्थिति आई कि जहां मरीज अंतिम साँस ले रहा था और चिकित्सक ने भी खुद को असमर्थ पाया, सारा दवा निष्फल हो गया | वैसे मरीज भी इस महामंत्र के जाप के प्रारम्भ होने के साथ ही स्वस्थ  होने लगे और कुछ ही दिनों में उसी डॉक्टर के सानिध्य में पूर्ण स्वस्थ हो गए। महामृत्युन्जय की शरण में आये व्यक्ति की अकाल मृत्यु कभी नहीं हो सकती| इस महामंत्र का यह चमत्कारी प्रभाव सर्व लोक विदित है| मृत्युंजय की शक्ति श्री बगलामुखी है जो अमृतेश्वरी है और शिव स्वयं अमृतेश्वर। चूँकि हम सभी उस अमृतेश्वर सदाशिव के ही अंश है | इसलिए हम सभी जीव भी अमृत  स्वरूप है पर प्रारब्ध वश नाना प्रकार के विषों के संताप  से स्वयं के ऊपर नश्वरता का आवरण चढाये हुए हैं | जिसके कारण जीवन में भांतिभांति के  ताप, श्राप से कष्ट भोगते है। पंच तत्वों से निर्मित हमारे शरीर में अगर किसी एक तत्व का भी संतुलन बिगड़ जाए तो शरीर बीमार हो जाता है|

ऐसी स्थिति में महामृत्युंजय परम औषधि समान  भी हैपुराणों में वर्णित मार्कण्डेय ऋषि द्वारा श्री विष्णु की स्तुति मृत्युंजय रूप में भी की गई हैंश्री रामचरितमानस में भी वर्णित श्री राम का एक मन्त्र मृत्युंजय का है जो अनुभूत अमोघ हैश्री पंचमुखी हनुमान जी के एक हाथ में अमृत कलश हैगणपति अमृत तत्व प्रदान करते हैंसूर्य चन्द्र जीवन दायिनी है,शिव मस्तक पर चन्द्रकला से बहती सुधा प्रातः के सूर्य उदय से ओज तेजआयु वृद्धि प्रदाता है और इन सभी का जो मुख्य आधार है वह है महामृत्युंजय। मेरे जीवन में जो  मन्त्र सर्वाधिक कल्याणकारी साबित हुआ और जिसने हर समस्या को पल भर में छूमंतर कर दिया, वह महामृत्युन्जय मन्त्र ही है | इसी कारण मैंने किसी भी अनुष्ठान के दौरान कई दिव्य शक्ति मंत्र प्रयोगश्री विष्णु प्रयोगदश महाविद्याश्री गणेशहनुमान जी के प्रयोग के साथ महामृत्युंजय का प्रयोग अवश्य कराया और ऐसे ऐसे चमत्कारिक एवं लाभकारी प्रतिफल दृष्टिगोचर हुए जो अति सुखद रहे और इस महामंत्र की महिमामंडन के साथ इसपे मेरे विश्वास को और बढ़ा दिए

 

मेरा अनुभव है कि अत्यधिक पाप कर्म करने वाले, जनमानस को कष्ट देने वाले भी अगर सच्चे मन से इनकी शरण में आत्मसमर्पण कर आये तो उनका भी कल्याण सम्भव है | आयु पूर्ण हो जाने परशरीर के सारे अंग खराब हो जाने पर इनकी उपासना से ज्यादा कष्ट नहीं भोग कर जीवात्मा शीघ्र प्रयाण को प्राप्त करता है | चूँकि वैसी असहाय स्थिति में मरीज स्वयं इनका जप कर सकता है, करा ही सकता है| इसका कारण यह भी है कि आज के वर्तमान भौतिकवादी  युग में स्वार्थी मनुष्य किसी भी धार्मिक क्रियाकलापों के संपादन से पूर्व काफी सोच विचार करने लगते हैं और पूर्ण विश्वास एवं श्रद्धा के बिना कोई भी दैवीय कृपा प्राप्त होना असंभव होता है।जीवन यात्रा एक दर्शन है जो हमें अपने जीवन में सत्कर्म द्वारा उपार्जित सकारात्मक उर्जा से जीवन को जीवंत, सुंदर एवं प्रभावशाली बना कर अंत में परमसता परमेश्वर में लीन होने से पूर्व परम धाम की पावन यात्रा प्रदान करता है।हर इंसान का अपनाअपना प्रारब्ध है उसके अपने कर्म और रिश्तेनाते हैपर इंसान का श्रेष्ठ गुण ,विन्रमता,सेवाकरुणा,दया  प्रेम अगर समाहित हो तो ईश्वरीय कृपा शीघ्र प्राप्त होती हैं। आज ईश्वरीय कृपा से मै जो भी कर रहा हूँ, वह मेरा कार्य भी अवश्य ही पूर्व निश्चित होगा

दूसरों के दुख दर्द मुझे पीड़ा देते हैंमैं अभाववेदना कष्टआंसू किसी की देखता हूँ तो हृदय द्रवित हो जाता है। मैं एक तुच्छ आमलोगों के जैसा ही इंसान हूँ और आपके दुख दर्द को दूर करने हेतु प्रयासरत रहता हूँ।वर्षों से दिव्यात्माओं ने देवताओं ने मुझे जन कल्याणार्थ प्रेरित किया है और अपनी सीमित दायरे में मैं निरन्तर कोशिश करता रहता हूँ।पर इस सत्य से भी अवगत हूँ कि इस पूरी प्रक्रिया में मैं कुछ नहीँ हूँकरने,कराने वाले परमात्मा शिव ही है। मैं तो बस एक छोटा सा माध्यम मात्र हूँ।इश्वर द्वारा लिखित विधि के विधान अमिट है, उसे कोई नहीं बदल सकता| जो जीवन में पूर्व निर्धारित है होकर रहेगा लेकिन प्रभु कृपा से इस महामृत्युंजय रूपी अमृत पयोधि की दिव्य धारा में जो कोई भी नहायेगा उसके जीवन में,परिवार में एक सुखद परिवर्तन अवश्य दृष्टिगोचर होगा | अपने विष रूपी प्रारब्ध पाप से तो हम पूर्व से ही नाना प्रकार के दारुण दुख भोग रहें है जहां अमृत की एक बूंद भी हमारे भाग्य को बदल कर रख देगी और हमारे जीवन में खुशियों का वह सुनहरा पल आएगा जो जीवात्मा को जीवात्मा से प्रेम करने के लिए प्रेरित करेगा और सभी प्राणिमात्र के प्रति सेवा का भाव उतपन्न करेगा | परन्तु इसके लिए भक्ति में पूरी श्रद्धा,विश्वास और पूर्ण समर्पण का होना अनिवार्य है।

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मेरे द्वारा निर्मित यह महामृत्युंजय परिवार एक दिव्य परा ज्ञान की वो सुधा धारा है जिसके सम्पर्क में आकर सभी उस अमृत धारा से जुड़ जायेंगे|मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले सुलभता से मोक्ष को प्राप्त करेंगे, जिसको धन,पद एवं प्रतिष्ठा की चाहत है, वो मनवांछित फल प्राप्त करेंगे | यानी बस एक शिव के दिव्य धारा के सम्पर्क में आने से सभी को सबकुछ मिल जायेगा| शिव ही सदाशिव मृत्युंजय श्री महाविष्णु हैइनके एक भाग में गायत्री तो दुसरे भाग में श्री विष्णु है , ये सम्पूर्ण लोकों के स्वामी निर्गुण निराकार आदि ब्रह्म है जो जीव के सृजन का कारण साक्षात महाशक्ति स्वरूप हैसम्पूर्ण ज्ञान भी इनके समक्ष अज्ञानी सा प्रतीत होता है | ये ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड के ईश्वर,माता पितास्वामी है।विष क्या है और इसका प्रभाव क्या हैजो इस संसार में आता है वो कितना भी समर्थ क्यूँ हो उसकी मृत्यु शाश्वत सत्य हैआत्मा तो स्वयं अमृत पुत्र है पर शरीर का नाश निश्चित हैदेवमानवजीव और यहां तक कि यह जगत भी सब के सब हर युग में बारम्बार अवतरित होकर नष्ट होते रहते हैंदेवताओं की भी आयु निश्चित है। सभी देवताओं में कालकूट विष ग्रहण करने की शक्ति किसी में भी नहीं थीइस जगत में एकमात्र शिव ही वैसे नीलकंठ है जो कालकूट विष हो या हमारे अनन्त जीवन के पाप रूपी विष सबको पीकर हमारे पाप रूपी विष का शमन करते है। हमारी बुद्धिहमारामनहमारा शरीरहमारी चेतनायहाँ तक कि हमारे दुष्कर्म जिनसे दूसरों को पीड़ा पहुंचती है, विष के सदृश है। इन सभी विषों को पीकर जो हमें अमृत प्रदान करे वह सदाशिव मृत्युंजय ही है।क्या आपने सुना है कि अमृत का कभी नाश होता है?अमृत सदा हमारे सद्कर्मों से उत्सर्जित होता रहता है।जो इस जगत का परम ज्योति परम विभु हैजो घटित होने वाली हर घटना का प्रत्यक्ष साक्षी हैजो मूर्ति,कर्मकांड,ध्यानयोग से परे ईश्वर है वहीं शिव है।

हमे प्रेम,भाव और ध्यान सूत्र का भी ज्ञान होना अत्यावश्यक है, क्योंकि बिना इसे जाने शिव को बस हम एक लिंग रूपी देवता मात्र समझ बैठते हैं।वास्तविकता यह है कि यह कही स्थूल तो कही सूक्ष्म स्वरूप में कण कण में प्रत्येक जीवात्मा के अंदर आत्मरूप में प्रकाशित है। यह सब स्वामी अमृतेश्वर मृत्युंजय सदाशिव का ही स्वरूप है। आज के वर्तमान परिदृश्य में इन विकृतियों के ही कारण ब्रह्मांडीय उथल पुथल आरम्भ हो गई हैप्रकृति भी उग्र रूप धारण करने लगी है,पृथ्वी हमारे पाप से त्रस्त हो गई हैआकाश में अति भयावह स्थिति में आनेवाले अति विनाशकारी तांडव का कारण हमारी विकृत कृत्य का ही प्रतिफल है। जब हम और हमारी आनेवाली पीढ़ी ही विकृत हो जायेगी,विष से पूरा जगत दूषित हो जायेगा तो आवश्यक है उससे पूर्व हम अमृत की जीवनदायिनी धारा से  पृथ्वी और ब्रह्मांडीय विषदोष का क्षय कर दे। इस कल्याणकारी कार्य की ओर हम स्वयं एक कदम बढ़ाए और अपने आगे की पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य प्रदान करे। इतना विश्वास रखिये कि शिव मृत्युंजय की अमृत धारा के संपर्क में आकर तत्क्षण आपके हर दोष का शमन होगा।  शिव और समस्त देवताओं में अपनी पूर्ण आस्था रखियेसंशय और शंका की डोर त्यागिये और सोचने की चिंतन धारा बदलिए।आपके सत्कर्म ही आपके वास्तविक धर्म मार्ग का निर्धारण करेंगे। जगत के हर प्राणिमात्र से प्रेम करिये, खुद के साथ सभी से प्रेम करिये, अपने सत्य मार्ग और ईश्वर के प्रति स्नेह रखिये। आप सभी दिव्य अमृत पुत्र हैइसलिए अपने अज्ञानता रूपी विष को इस अमृत धारा में त्याग कर जन्म जन्मांतर के सारे दोष से मुक्त हो जाइए।सदाशिव श्री महाविष्णु श्री हरि हैये ही श्री राम यही श्री श्याम है, यही आदि शक्ति जगदम्बा है। राम और श्याम सिर्फ त्रेता के या द्वापर के अवतरित अवतार भर नहीं है ये तो आदि राम और कृष्ण है। 

आज श्री राम श्याम के नाम की अमरता की सार्थकता इसलिए है कि जगत के जो कारण तत्व है जो आदि महावीर के नाम से विख्यात है यही युग युग से अमृत धारा में संरक्षक के रूप में इस जगत को रक्षित कर रहें हैं इन्हीं को श्री हनुमानजी कहा जाता है। ये पंचमुखी रूप में भक्तों के सारे विष को दूर करते हैंराम,कृष्ण कई हो सकते है पर आदि राम और आदि कृष्ण श्री महाविष्णु हरि ही है। हरि ही वह मंत्र है जो जगत के कल्याण का उद्गम है।

आज सब अहंकार में जी रहे हैं, माया, तृष्णा और स्वार्थ की ऐसी पट्टी हमारी आँखों पर लगी है कि उन्हें कुछ और दिखता ही नहीं है। हर अहंकारी और दम्भी मिथ्यावाश स्वयं को आध्यात्मिक बताते हैं। परंतु अध्यात्म क्या है? यह जानना और समझना कोई नहीं चाहता क्योंकि उसके लिए जो त्याग, बलिदान और समर्पण चाहिए, वह कोई भी नहीं देना चाहता। परंतु अध्यात्म तो वह वृक्ष है जो त्याग, समर्पण और प्रेम की धरती पर प्रस्फुटित और पल्लवित होता है। धन, पद, प्रतिष्ठा के मद में सब ऐसे चूर हैं कि किसी अन्य के प्रति प्रेम, विरह की प्यास ही नहीं उठती अब इनके हृदय में।ऐसे परिस्थिति में क्या अध्यात्म समूल नष्ट हो जाएगा? क्या राम के आदर्श, शिव का प्रेम, राधा का प्रेम, सब विलुप्त और मृतप्राय हो जाएगा? आज कौन है ऐसा जो शिव के लिए या अपने इष्ट की विरह वेदना और भक्ति में रोना, बिलखना चाहता है? अब कोई कहाँ है ऐसा जो अपना सब कुछ, अपना समस्त जीवन न्यौछावर कर सके बस शिव के प्रेम में? फिर वर्तमान परिदृश्य में कैसे होगी सनातन धर्म की रक्षा? कौन सहेज पाएगा और संजो कर रख पायेगा हमारी आदि संस्कृति के मूल्यवान बीजों को?

इसके लिए किसी को तो स्वयं के मान अपमान और झूठे अहंकार के दम्भ से उपर उठकर आगे आना होगा।किसी को तो नीलकंठ महादेव की तरह सम्पूर्ण संसार का विष पीना ही पड़ेगा। कोई तो ऐसा युग पुरुष इस धरा पर फिर से जन्म लेगा ही जो सनातन संस्कृति की स्थापना और सुरक्षा के लिए अपना सर्वस्व जीवन न्यौछावर कर देगा। यह सृष्टी शिव की है, शिवा की है, जो ब्रह्मांड के कण कण में व्याप्त हैं। अपनी ही सृष्टी को धर्म विहीन होते, संस्कृति विहीन होते कैसे देख पाएंगे वे? इस लिए हर युग में, हर काल में शिव भिन्न भिन्न रुप धर कर अपने भक्तों की रक्षा के लिए धर्म और सभ्यता,संस्कृति की पुनर्स्थापना हेतु इस धरा पर अवश्य अवतरित होते है। आज इस कलियुग में भी आदिदेव शिव हमसब जीवों के लिए जीवनदायिनी शक्ति, परम् कल्याणकारी महामृत्युंजय के अद्भुत स्वरूप में पुनः पधारे है, जिनकी कृपा से अमृत धारा के सान्निध्य में आकर सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण निश्चित है।